Fiscal Policy in Hindi: राजकोषीय नीति क्या है तथा राजकोषीय नीति के मुख्य उद्देश्य क्या हैं?

Fiscal Policy in Hindi: राजकोषीय नीति किसी देश की सरकार द्वारा बनाई जाने वाली ऐसी नीति है जिसके माध्यम से सरकार देश में आर्थिक स्थिरता, मुद्रास्फीति पर नियंत्रण, बेरोजगारी दर में कमी और सतत आर्थिक विकास को बढ़ावा देने का कार्य करती है। इन सभी लक्ष्यों की प्राप्ति मुख्यतः कराधान एवं सार्वजनिक व्यय के माध्यम से करी जाती है।

राजकोषीय नीति क्या है? इस विषय में ऊपर आपने संक्षेप में जाना, आर्थिक पाठशाला से जुड़े इस लेख में आगे विस्तार से चर्चा करेंगे राजकोषीय नीति या Fiscal Policy की जानेंगे राजकोषीय नीति क्या है? राजकोषीय नीति के मुख्य उद्देश्य क्या हैं? राजकोषीय नीति किसके द्वारा तैयार की जाती है? मौद्रिक नीति और राजकोषीय नीति में क्या अंतर है? राजकोषीय नीति कैसे काम करती है तथा राजकोषीय नीति क्यों महत्वपूर्ण है?

राजकोषीय नीति क्या है?

किसी सरकार द्वारा राजस्व को बढ़ाने और व्यय में वृद्धि करने के संबंध में जिस नीति का निर्माण किया जाता है उसे राजकोषीय नीति, बजटीय नीति या Fiscal Policy कहते हैं। राजकोषीय नीति में सरकार मुख्यतः दो मुद्दों पर कार्य करती हैं जिनमें 1) ऐसी मदें जिन पर सरकार को खर्च करना है और 2) खर्चों के वित्तपोषण के लिए सरकार को किस प्रकार संसाधन जुटाने चाहिए शामिल हैं।

राजकोषीय नीति किसी भी देश की सरकार के आर्थिक टूलकिट का एक अहम हिस्सा है, जो उस देश की अर्थव्यवस्था को समग्र रूप से बेहतर आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। राजकोषीय नीति कुछ मायनों में केन्द्रीय बैंक की मौद्रिक नीति (Monetary Policy) के समान काम करती है

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उदाहरण के लिए मंदी की स्थिति में सरकार मांग को प्रोत्साहित करने तथा आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए टैक्स की दरों में कटौती कर सकती है या विभिन्न योजनाओं के माध्यम से सार्वजनिक खर्च को बढ़ा सकती है।

इसके विपरीत महंगाई की स्थिति में सरकार टैक्स की दरों में वृद्धि कर सकती है या खर्च में कटौती कर सकती है। राजकोषीय नीति में विशिष्ट आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कराधान (Taxation) और सार्वजनिक व्यय से संबंधित फैसले शामिल होते हैं।

राजकोषीय नीति के मुख्य उद्देश्य क्या हैं?

राजकोषीय नीति किसी देश की अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाये रखने तथा समग्र आर्थिक-सामाजिक विकास के लिए एक शक्तिशाली टूल है। इसके माध्यम से सरकारें बेरोजगारी दर में नियंत्रण, आय समानता जैसे विभिन्न आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए काम करती हैं, आगे हमनें राजकोषीय नीति के कुछ मुख्य उद्देश्यों के बारे में विस्तार से चर्चा करी है-

जैसा कि हमनें ऊपर समझा राजकोषीय नीति के मुख्यतः दो घटक हैं, जिनमें सार्वजनिक व्यय तथा खर्चों के वित्तपोषण के लिए संसाधनों को जुटाना शामिल है। सरकार विभिन्न क्षेत्रों में सार्वजनिक व्यय के माध्यम से देश के आर्थिक विकास को बढ़ावा देती है, ऐसे खर्चों में आधारभूत संरचना (Infrastructure) जैसे सड़क, हवाई अड्डे, नहर, रेल, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाएं, पानी और बिजली की आपूर्ति, दूरसंचार इत्यादि का निर्माण, भारी उद्योगों की स्थापना आदि मुख्य रूप से शामिल हैं।

किसी भी देश के विभिन्न क्षेत्रों (शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, बिजली इत्यादि) में आधारभूत संरचना का निर्माण करने के लिए शुरुआत में एक भारी निवेश की जरूरत होती है और ये निवेश सरकारों को ही वहन करना पड़ता है, हालांकि देश में एक मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर के बन जाने के पश्चात यह निजी क्षेत्र द्वारा विदेशी एवं घरेलू निवेश को आकर्षित करता है जो अंततः देश के आर्थिक विकास में अपनी भूमिका निभाता है।

राजकोषीय नीति किसी देश में रोजगार के अवसरों को पैदा करने में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सरकार सार्वजनिक व्यय के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में निर्माण कार्यों के जरिए, पब्लिक सेक्टर की कंपनियों की स्थापना कर, विभिन्न योजनाओं के तहत सस्ती दरों में लोन, आर्थिक सहायता या अनुदान के माध्यम से भी सीधे तौर पर रोजगार के नए-नए अवसर पैदा करती है।

इसके अलावा सरकार राजकोषीय नीति के दूसरे घटक कराधान के माध्यम से भी अप्रत्यक्ष तौर पर रोजगार सृजन का काम करती है, टैक्स की दरों में कमी अथवा छूट के माध्यम से सरकार निजी क्षेत्र को उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करती है, जिसके परिणामस्वरूप रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं।

आर्थिक असमानता देश की एक सबसे बड़ी चुनौती है, किन्तु एक बेहतर राजकोषीय नीति के माध्यम से सरकार इस असमानता को कम करने की दिशा में काम करती है। सरकार उच्च आय वर्ग वाले लोगों से कर वसूलती है और इसे आर्थिक अनुदानों, विभिन्न योजनाओं जैसे मुफ़्त राशन, फ्री हेल्थकेयर इत्यादि के माध्यम से गरीब तबके को लाभ पहुँचने की कोशिश करती है।

आर्थिक समानता के अलावा सरकार प्रत्येक नागरिक को सामाजिक समानता सुनिश्चित करने के लिए एक प्रभावशाली प्रशासन की स्थापना भी करती है और इसके लिए सरकार पुलिस, रक्षा, न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका आदि पर खर्च करती है।

सरकार सार्वजनिक व्यय के माध्यम से अति आवश्यक सेवाओं में खर्च करती है ताकि इनकी कीमतों में स्थिरता बनी रहे और आम नागरिक बिना किसी परेशानी के उनका उपभोग कर सके। इन सेवाओं में शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, बिजली, पानी, घरेलू गैस, दूरसंचार, उचित मूल्य की राशन की दुकानें आदि शामिल हैं।

भुगतान संतुलन एक फाइनेंशियल रिकॉर्ड होता है, जिसमें किसी एक वर्ष के दौरान किसी देश के विश्व के साथ होने वाले समस्त मौद्रिक लेन-देन की जानकारी होती है। इसमें किसी देश द्वारा विदेशियों को किया गया कुल भुगतान तथा विदेशियों से कुल प्राप्तियों का ब्यौरा होता है।

भुगतान संतुलन क्या है इसे विस्तार से पढ़ने के लिए लिंक खोलें 👉 Balance of Payments (BOP) या भुगतान संतुलन क्या है तथा इसके विभिन्न घटक कौन से हैं?

यदि विदेशियों को किया गया कुल भुगतान, उनसे हुई कुल प्राप्तियों से अधिक हो तो इस स्थिति को भुगतान संतुलन घाटा कहा जाता है और इससे निपटने में राजकोषीय नीति एक अहम टूल की तरह काम करती है। सरकार इस नीति के माध्यम से आयात किये गए उत्पादों पर अधिक टैक्स लगाती है, जिससे आयात हतोत्साहित होता है साथ ही सरकार निर्यात को प्रोत्साहित करने के लिए आर्थिक सहायता एवं नियम कानूनों में भी ढील देती है।

भारतीय रिजर्व बैंक अपनी मौद्रिक नीति (Monetary Policy) के माध्यम से अर्थव्यवस्था में मुद्रा के प्रवाह को नियंत्रित करता है तथा महंगाई दर को नियंत्रण में रखता है। मौद्रिक नीति के समान सरकार भी राजकोषीय नीति के माध्यम से महंगाई को नियंत्रित करती है। सार्वजनिक व्यय तथा टैक्स की दरों में बदलाव कर सरकार अर्थव्यवस्था में धन की आपूर्ति को नियंत्रित (कम या ज्यादा) करती है।

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राजकोषीय नीति कैसे काम करती है?

राजकोषीय नीति के क्रियान्वयन के लिए उपयोग किए जाने वाले प्राथमिक उपकरण सार्वजनिक व्यय और कराधान (Taxation) हैं। अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति को देखते इन दोनों टूल्स का इस्तेमाल किस प्रकार किया जाए इसी उद्देश्य के लिए राजकोषीय नीति का निर्माण किया जाता है।

आइए अब एक-एक कर समझते हैं राजकोषीय नीति के ये दोनों टूल्स किस प्रकार देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं। सार्वजनिक खर्च कर सरकार विभिन्न योजनाओं, परियोजनाओं, अनुदानों आदि के द्वारा अर्थव्यवस्था में धन की आपूर्ति को बढ़ाती है, जिससे लोगों के पास खर्च करने के लिए अधिक पैसा आता है, मांग बढ़ने से उत्पादन में वृद्धि होती है और रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं। इसके विपरीत महंगाई बढ़ने की स्थिति में सरकार खर्च में कटौती करती है ताकि अर्थव्यवस्था से धन की आपूर्ति को कम किया जा सके।

सार्वजनिक व्यय के अलावा कराधान के माध्यम से भी सरकार अर्थव्यवस्था में धन के प्रवाह को नियंत्रित करती है। यदि सरकार करों को कम करती है तो इससे उपभोक्ता खर्च (खपत) और व्यावसायिक निवेश में वृद्धि होती है। इसके विपरीत यदि सरकार अधिक राजस्व उत्पन्न करने के लिए टैक्स की दरों को बढ़ाती है तो इससे आर्थिक विकास दर धीमी होती है तथा मंदी जैसी संभावनाएं बनती हैं।

मौद्रिक नीति और राजकोषीय नीति में क्या अंतर है?

मौद्रिक नीति किसी देश के केन्द्रीय बैंक (भारत की स्थिति में रिजर्व बैंक) द्वारा तैयार करी जाती है, जो विभिन्न टूल्स का इस्तेमाल करते हुए अर्थव्यवस्था में मुद्रा के प्रवाह को नियंत्रित करती है।

किसी भी अर्थव्यवस्था में मुद्रा या धन का अधिक प्रवाह “महँगाई” का कारण बनता है वहीं मुद्रा की मात्रा कम हो जाने से “अपस्फीति” का जन्म होता है इसलिए अर्थव्यवस्था में मुद्रा के प्रवाह को संतुलित करना बेहद आवश्यक है।

राजकोषीय नीति को देश की सरकार द्वारा बनाया और लागू किया जाता है, जिसके द्वारा टैक्स की दरों और सरकारी खर्चों का उपयोग करके आर्थिक गतिविधियों को नियंत्रित किया है।

सार-संक्षेप

राजकोषीय नीति मुख्य रूप से खर्च, उधार और कराधान को प्राथमिकता देते हुए किसी देश की अर्थव्यवस्था को अल्प, मध्यम और लंबी अवधि में चलाने के लिए सरकार की एक योजना है। एक बेहतर राजकोषीय नीति किसी भी देश के आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिए बेहद आवश्यक है।

राजकोषीय नीति में समय के अनुसार निरंतर परिवर्तन देखने को मिलता है, अर्थव्यवस्था में आई तेजी और मंदी तथा विभिन्न राजनीतिक दलों के सत्ता में आने के साथ-साथ राजकोषीय नीति की प्राथमिकताएं भी बदलती रहती हैं।

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