नॉन परफॉर्मिंग एसेट या NPA क्या है? NPA के कारण और प्रभाव

NPA Meaning in Hindi: नॉन परफॉर्मिंग एसेट या NPA मुख्य रूप से बैंकिंग व्यवस्था में इस्तेमाल होने वाली शब्दावली है, इसका प्रयोग बैंकों द्वारा किसी खराब लोन को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है, खराब लोन से आशय बैंकों द्वारा दिए गए ऐसे लोन से है, जिसके पुनर्भुगतान (Repayment) की संभावना बहुत कम होती है।

यहाँ आपने नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स के बारे में संक्षेप में जाना, लेख में आगे विस्तार में चर्चा करेंगे NPA अथवा गैर निष्पादित परिसंपत्तियों की और जानेंगे NPA क्या है? इसके क्या कारण हैं? अर्थव्यवस्था पर NPA के क्या प्रभाव पढ़ते हैं और NPAs से निपटने के लिए सरकार द्वारा क्या प्रयास किये जा रहे हैं?

नॉन परफॉर्मिंग एसेट या NPA क्या है?

बैंकिंग व्यवस्था से आप सभी परिचित हैं, बैंकिंग व्यवस्था में मुख्यतः जमा या डिपॉजिट स्वीकार किया जाता है तथा ग्राहकों को उचित ब्याज दरों पर ऋण उपलब्ध कराया जाता है।

भारत में बैंकिंग सिस्टम की कार्यप्रणाली तथा बैंकों के प्रकरों के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें 👉 भारत में कितने प्रकार के बैंक हैं और ये बैंक किस प्रकार अपना कार्य करते हैं?

बैंकों द्वारा ग्राहकों को दिया गया कर्ज, बैंकों के लिए परिसंपत्ति या एसेट होता है। एसेट एक ऐसी संपत्ति होती है जो नियमित आय का सृजन करती है। बैंक अपने ग्राहकों को लोन देते हैं और उससे मिलने वाला ब्याज उनकी आय या इनकम होती है। बैंकों द्वारा दिया गया ऐसा ऋण, जिसके ब्याज अथवा मूलधन का भुगतान 90 या उससे अधिक दिनों से बैंक को नहीं किया गया है उसे गैर निष्पादित परिसंपत्ति या Non-Performing Asset या शॉर्ट में NPA कहलाता है।

दिनों का यह मानक कुछ विशेष क्षेत्रों के लिए भिन्न हो सकता है, उदाहरण के तौर पर कृषि के लिए लिया गया अल्पकालिक फसल ऋण, जिसका ब्याज अथवा मूलधन ऐसी दो फसली मौसमों से जमा न किया गया हो नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स की श्रेणी में आता है, जबकि कृषि के लिए लिया गया दीर्घकालिक फसल ऋण जिसका ब्याज या मूलधन एक फसली मौसम से न दिया गया हो नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स या NPA कहलाता है।

नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स का वर्गीकरण

किसी ऋण के NPA घोषित हो जाने पर उसे समय के अनुसार पुनः निम्नलिखित तीन वर्गों में रखा जाता है। 

Sub-Standard Asset: बैंकों द्वारा दिया गया ऐसा लोन जो 1 वर्ष की अवधि से नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स की श्रेणी में हो सब-स्टैंडर्ड एसेट कहलाता है।

Doubtful Assets: ऐसे लोन जो एक वर्ष की अवधि से अधिक समय से Sub-Standard Assets की श्रेणी में हो डाउटफुल ऐसेट्स कहलाते हैं। इस श्रेणी के तहत शामिल किये गए लोन के पुनर्भुगतान या Repayment की संभावना बेहद कम होती है, हालांकि अभी इसे बैंक द्वारा हानि (Loss) नहीं माना जाता है।

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Loss Assets: बैंक द्वारा दिए गए ऐसे सभी लोन जो 36 माह की अवधि से नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स या NPA की श्रेणी में शामिल किये गए हो उन्हें लॉस ऐसेट्स कहा जाता है। ऐसे लोन के पुनर्भुगतान की कोई संभावना नहीं होती है। इस श्रेणी में आने वाले लोन को बैंकों द्वारा सामान्यतः हानि मान लिया जाता है और उसे बैंक की बैलेंस शीट में हानि के रूप में दर्शा दिया जाता है।

NPA बढ़ने के मुख्य कारण

  • कृषि क्षेत्र के NPAs बढ़ने का मुख्य कारण कृषि क्षेत्र की अनिश्चितता एवं किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य न मिलना है।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का खराब प्रबंधन भी नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स के बढ़ने का एक मुख्य कारण है। 
  • औधोगिक उत्पादन में कमी के चलते कम्पनियाँ ऋण का समय पर भुगतान नहीं कर पाती, जिससे नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स या NPA बढ़ता है।
  • वैश्विक मंदी, महामारी आदि के चलते भी कई स्थितियों में कम्पनियाँ एवं आम लोग समय पर ऋण का भुगतान नहीं कर पाते हैं। साल 2020 में आई कोविड महामारी इसका हालिया उदाहरण है, वैश्विक महामारी का कई छोटे और मध्यम उद्योगों पर बेहद बुरा असर पड़ा जिसके चलते कंपनियों, आम लोगों के लिए समय पर ऋण चुकाना मुश्किल हो गया और कई लोन NPAs में तब्दील हो गए।

NPA के प्रभाव

NPA का विभिन्न क्षेत्रों यथा बैंकिंग क्षेत्र, सरकारी क्षेत्र तथा सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था पर ही नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है, ऐसे ही कुछ मुख्य नकारात्मक प्रभाव निम्नलिखित हैं। 

  • बैंकों को होने वाले लाभ में कमी आती है जिसके चलते बैंकों के संसाधन सीमित होते हैं
  • बैंकों में साख की कमी होती है, परिणामस्वरूप निवेश दर में कमी आती है तथा नए उद्योगों, स्टार्टअप्स आदि को ऋण लेने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है
  • निवेश दर के घटने से उत्पादन में कमी आती है तथा बेरोजगारी दर बढ़ती है
  • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में NPA के बढ़ने के कारण सरकार को बैंकों के लिए अतिरिक्त पूँजी की आवश्यकता पड़ती है, जिससे जन कल्याणकारी योजनाओं में कमी आती है

NPA कम करने के उपाय

NPA में कमी करने के लिए सरकार ने समय समय पर कई नीतियाँ बनाई हैं। उदाहरण के तौर पर सरफेसी एक्ट 2002 (यह कानून बैंकों तथा वित्तीय संस्थाओं को अधिकार देता है की वे ऋणी द्वारा ऋण न चुका पाने की स्थिति में उसकी संपत्तियों/परिसंपत्तियों को जब्त कर सकें), इंद्रधनुष अभियान (इसके तहत सरकारी बैंकों की कार्यकुशलता एवं प्रबंधन में सुधार कर उनके बढ़ते NPA को कम करने का लक्ष्य रखा गया है), इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) तथा 4R नीति, जिसके अंतर्गत NPA की समस्या से निपटने के लिए निम्न चार तरीके सुझाए गए हैं।

  • Recognition
  • Recapitalization
  • Resolution
  • Reforms

सार-संक्षेप

बैंकों द्वारा अपने ग्राहकों को दिया जाने वाला कर्ज या लोन उनकी आय का मुख्य स्रोत होता है। ये लोन उनके लिए किसी ऐसेट्स की तरह होते हैं, जिनसे बैंकों की नियमित इनकम होती रहती है। किन्तु यदि कोई उधारकर्ता, लिए गए कर्ज के ब्याज या मूलधन का भुगतान करना बंद कर दे तो ऐसे कर्ज को नॉन परफॉर्मिंग ऐसेट्स कहा जाता है अर्थात बैंक का ऐसा एसेट जिससे उसे आय होनी बंद हो चुकी है।

नॉन परफॉर्मिंग ऐसेट्स किसी भी देश के बैंकिंग सिस्टम समेत उसकी पूरी अर्थव्यवस्था के लिए ही हानिकारक होते हैं। बैंकिंग क्षेत्र पर NPAs के प्रभाव को कम करने तथा एक बेहतरीन लैंडिंग इकोसिस्टम को बढ़ावा देने के लिए सरकारों और नियामक एजेंसियों को इस दिशा में विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए।

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